एक चोर को चोर कह दो,
उसे कोई फर्क नहीं पड़ता।
पर एक ईमानदार को चोर कह के देखो,
उसके कानों में गूंजता है...
बार-बार गूंजता है ये एक ही शब्द।
वो दोनों हाथों से कान बंद करता है,
फिर भी सुनाई देता है।
प्रगाढ़ वेदना के साथ, प्रचंड तीव्रता से
कानों में बजता है बस एक ही टांकार —
"चोर, चोर, चोर... तू तो है एक चोर।"
वो रातों को सो नहीं पाता है,
नींद उसकी आँखों से रूठ जाती है।
खुद को माफ नहीं कर पाता है,
समझ नहीं पाता जाए तो जाए कहाँ।
मरना सिर्फ शरीर का ही, मृत्यु नहीं है,
किसी की छीन लो प्रतिष्ठा,तो वो जीते-जी मर जाता है।
सामाजिक तानों की चुभन को वो सह नहीं पाता है ,
खोकर इज्जत, मान और प्रतिष्ठा,वो जिंदा मुर्दा बन जाता है।
इस दुनिया से मोह भंग हो जाता है,
घुटन से निकलने का कोई रास्ता नहीं दिखता।
वो इतना विवश हो जाता है
कि उसे जीवन से ज्यादा मौत आसान लगती है।
और फिर रंगीन दुनिया को छोड़,
वो मौत को गले लगा लेता है।
पर क्या कभी सोचा है तुमने?
इस हत्या का जिम्मेदार कौन है?
ये हत्या है... स्वदाह नहीं।
हाँ, ये हत्या ही है, चाहे जग सारा मौन रहे।
किसी निरपराधी को तुमने धकेला है
आत्महत्या की राहों पर।
और इस निर्मम हत्या का क्रेडिट
सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे ही सर पर है।
सिर्फ तुम्हारे ही सर पर।